09 September 2005

माँ भारती के भाल की शृंगार है हिन्दी

माँ भारती के भाल की शृंगार है हिन्दी
हिन्दोस्तां के बाग की बहार है हिन्दी
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घुट्टी के साथ घोल के माँ ने पिलाई थी
स्वर फूट पड़ रहा, वही मल्हार है हिन्दी
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तुलसी, कबीर, सूर औ रसखान के लिए
ब्रह्मा के कमण्डल से बही धार है हिन्दी
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सिद्धान्तों की बात से न होएगा भला
अपनाएँगे न रोज के व्यवहार में हिन्दी
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कश्ती फँसेगी जब कभी तूफानी भँवर में
उस दिन करेगी पार, वो पतवार है हिन्दी
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माना कि रख दिया है संविधान में मगर
पन्नों के बीच आज तार-तार है हिन्दी
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सुन कर के तेरी आह 'व्योम` थरथरा रहा
वक्त आने पर बन जाएगी तलवार ये हिन्दी
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-डॉ॰ जगदीश व्योम
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